बारीश रुकनेकेबाद
छतसे टपकते हुए
आखरी बुंद की तरह
मे लटकता रहा....
धरती ओर छत के बीच
कोई दुसरी बुंद
आकर मिलती तो
या फिर अगले बारीश का
मे पेहला बुंद होता तो.....
ये सोचते सोचते
वक्त बीत गया
धरती और आकाशको
अजीबसी नजरोंसे देखते
वही सुख गया........
- विजय बिळुर
खाडाखोड
छतसे टपकते हुए
आखरी बुंद की तरह
मे लटकता रहा....
धरती ओर छत के बीच
कोई दुसरी बुंद
आकर मिलती तो
या फिर अगले बारीश का
मे पेहला बुंद होता तो.....
ये सोचते सोचते
वक्त बीत गया
धरती और आकाशको
अजीबसी नजरोंसे देखते
वही सुख गया........
- विजय बिळुर
खाडाखोड
Comments
Post a Comment